कभी डूबे तो तिनको ने दिया था हाथ बढ़कर के,
कभी कश्ती में थे फिर भी लहरों से मात खायी है...
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कभी ग़म से घिरे थे फिर भी हसीं ने साथ ना छोड़ा,
कभी खुशियों की महफ़िल में भी आँखें डबडबाई है...
( कुछ पंक्तियाँ एक मेरी एक कविता से जो मेरे अंतर्मन में है ...)
कभी कश्ती में थे फिर भी लहरों से मात खायी है...
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कभी ग़म से घिरे थे फिर भी हसीं ने साथ ना छोड़ा,
कभी खुशियों की महफ़िल में भी आँखें डबडबाई है...
( कुछ पंक्तियाँ एक मेरी एक कविता से जो मेरे अंतर्मन में है ...)
